ठाढ़ रहा अति कंपित गाता
ठाढ़ रहा अति कंपित गाता
चौपाई २, दोहा ९५ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
ठाढ़ रहा अति कंपित गाता। गयउ बिभीषनु जहँ जनत्राता॥ पुनि रावन कपि हतेउ पचारी। चलेउ गगन कपि पूँछ पसारी॥ २ ॥
अर्थ
रावण खड़ा रहा, पर उसका शरीर अत्यन्त काँपने लगा। विभीषण वहाँ गये जहाँ जनों के रक्षक श्रीरामजी थे। फिर रावण ने हनुमानजी को ललकारा। वे पूँछ फैलाकर आकाश में चले गये।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “रावण की माया, राम द्वारा नाश” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ९५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रावण की मायावी युद्धलीला और राम द्वारा उसका नाश का वर्णन है।
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रावण की माया, राम द्वारा नाश