देखा श्रमित बिभीषनु भारी

चौपाई १, दोहा ९५ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

देखा श्रमित बिभीषनु भारी। धायउ हनूमान गिरि धारी॥ रथ तुरंग सारथी निपाता। हृदय माझ तेहि मारेसि लाता॥ १ ॥

अर्थ

विभीषण को बहुत ही थका हुआ देखकर हनुमानजी पर्वत धारण किये हुए दौड़े। उन्होंने उस पर्वत से रावण के रथ, घोड़े और सारथी का संहार कर डाला और उसके सीने पर लात मारी।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “रावण की माया, राम द्वारा नाश” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ९५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रावण की मायावी युद्धलीला और राम द्वारा उसका नाश का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
रावण की माया, राम द्वारा नाश