जाना प्रताप ते रहे निर्भय कपिन्ह
जाना प्रताप ते रहे निर्भय कपिन्ह
छन्द, दोहा ९६ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
छन्द पाठ
जाना प्रताप ते रहे निर्भय कपिन्ह रिपु माने फुरे। चले बिचलि मर्कट भालु सकल कृपाल पाहि भयातुरे॥ हनुमंत अंगद नील नल अतिबल लरत रन बाँकुरे। मर्दहिं दसानन कोटि कोटिन्ह कपट भू भट अंकुरे॥
अर्थ
जो प्रभु का प्रताप जानते थे, वे निर्भय डटे रहे। वानरों ने शत्रुओं को सच्चा ही मान लिया। [इससे] सब वानर-भालू विचलित होकर हे कृपालु! रक्षा कीजिये! यों पुकारते हुए भय से व्याकुल होकर भाग चले। अत्यन्त बलवान् रणबाँकुरे हनुमानजी, अंगद, नील और नल लड़ते हैं और कपटरूपी भूमि से अंकुरों की भाँति उपजे हुए कोटि-कोटि योद्धा रावणों को मसलते हैं॥
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “रावण की माया, राम द्वारा नाश” प्रकरण का छन्द, दोहा ९६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रावण की मायावी युद्धलीला और राम द्वारा उसका नाश का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
रावण की माया, राम द्वारा नाश