संभारि श्रीरघुबीर धीर पचारि कपि रावनु
संभारि श्रीरघुबीर धीर पचारि कपि रावनु
छन्द, दोहा ९५ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
छन्द पाठ
संभारि श्रीरघुबीर धीर पचारि कपि रावनु हन्यो। महि परत पुनि उठि लरत देवन्ह जुगल कहुँ जय जय भन्यो॥ हनुमंत संकट देखि मर्कट भालु क्रोधातुर चले। रन मत्त रावन सकल सुभट प्रचंड भुज बल दलमले॥
अर्थ
श्रीरघुवीर का स्मरण करके धीर हनुमानजी ने ललकारकर रावण को मारा। वे दोनों पृथ्वी पर गिरते और फिर उठकर लड़ते हैं; देवताओं ने दोनों की जय-जय पुकारी। हनुमानजी पर संकट देखकर वानर-भालू क्रोधातुर होकर दौड़े। किन्तु रण-मत्त रावण ने सब योद्धाओं को अपने प्रचण्ड भुजाओं के बल से कुचल और मसल डाला॥
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “रावण की माया, राम द्वारा नाश” प्रकरण का छन्द, दोहा ९५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रावण की मायावी युद्धलीला और राम द्वारा उसका नाश का वर्णन है।
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रावण की माया, राम द्वारा नाश