भुज उठाइ रघुपति कपि फेरे
भुज उठाइ रघुपति कपि फेरे
चौपाई २, दोहा ९७ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
भुज उठाइ रघुपति कपि फेरे। फिरे एक एकन्ह तब टेरे॥ प्रभु बलु पाइ भालु कपि धाए। तरल तमकि संजुग महि आए॥ २ ॥
अर्थ
श्री रघुनाथजी ने भुजा उठाकर सब वानरों को लौटाया। तब वे एक-एक को पुकार-पुकारकर लौट आये। प्रभु का बल पाकर रीछ-वानर दौड़ पड़े। जल्दी से कूदकर वे रणभूमि में आ गये।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “रावण की माया, राम द्वारा नाश” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ९७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रावण की मायावी युद्धलीला और राम द्वारा उसका नाश का वर्णन है।
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रावण की माया, राम द्वारा नाश