सोहहिं नभ छल बल बहु करहीं
सोहहिं नभ छल बल बहु करहीं
चौपाई ४, दोहा ९५ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
सोहहिं नभ छल बल बहु करहीं। कज्जलगिरि सुमेरु जनु लरहीं॥ बुधि बल निसिचर परइ न पार्यो। तब मारुतसुत प्रभु संभार्यो॥ ४ ॥
अर्थ
दोनों बहुत-से छल-बल करते हुए आकाश में ऐसे शोभित हो रहे हैं मानो कजलगिरि और सुमेरु पर्वत लड़ रहे हों। जब बुद्धि और बल से राक्षस गिराये न गिरा तब मारुति श्रीहनुमानजी ने प्रभु को स्मरण किया।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “रावण की माया, राम द्वारा नाश” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ९५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रावण की मायावी युद्धलीला और राम द्वारा उसका नाश का वर्णन है।
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रावण की माया, राम द्वारा नाश