दहँ दिसि धावहिं कोटिन्ह रावन
दहँ दिसि धावहिं कोटिन्ह रावन
चौपाई ३, दोहा ९६ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
दहँ दिसि धावहिं कोटिन्ह रावन। गर्जहिं घोर कठोर भयावन॥ डरे सकल सुर चले पराई। जय कै आस तजहु अब भाई॥ ३ ॥
अर्थ
दसों दिशाओं में करोड़ों रावण दौड़ते हैं और घोर, कठोर, भयानक गर्जन कर रहे हैं। सब देवता डर गये और ऐसा कहते हुए भाग चले कि हे भाई! अब जय की आशा छोड़ दो!
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “रावण की माया, राम द्वारा नाश” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ९६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रावण की मायावी युद्धलीला और राम द्वारा उसका नाश का वर्णन है।
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रावण की माया, राम द्वारा नाश