सब सुर जिते एक दसकंधर

चौपाई ४, दोहा ९६ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

सब सुर जिते एक दसकंधर। अब बहु भए तकहु गिरि कंदर॥ रहे बिरंचि संभु मुनि ग्यानी। जिन्ह जिन्ह प्रभु महिमा कछु जानी॥ ४ ॥

अर्थ

एक ही रावण ने सब देवताओं को जीत लिया था, अब तो बहुत-से रावण हो गये हैं। इससे अब पहाड़ की गुफाओं का आश्रय लो। वहाँ ब्रह्मा, शम्भु और ज्ञानी मुनि ही डटे रहे, जिन्होंने प्रभु की कुछ महिमा जानी थी।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “रावण की माया, राम द्वारा नाश” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ९६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रावण की मायावी युद्धलीला और राम द्वारा उसका नाश का वर्णन है।

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रावण की माया, राम द्वारा नाश