बचन कर्म मन कपट तजि भजेहु
बचन कर्म मन कपट तजि भजेहु
दोहा ६४ · लंकाकाण्ड
दोहा पाठ
बचन कर्म मन कपट तजि भजेहु राम रनधीर। जाहु न निज पर सूझ मोहि भयउँ कालबस बीर॥ ६४ ॥
अर्थ
मन, वचन और कर्म से कपट छोड़कर रणधीर श्रीरामजी का भजन करना। हे भाई! मैं काल के वश हो गया हूँ, मुझे अपना-पराया नहीं सूझता; इसलिये अब तुम जाओ।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “कुंभकर्ण का जागना और उपदेश” प्रकरण का दोहा ६४ है। इस प्रकरण में रावण द्वारा कुंभकर्ण को जगाने, उसके कठोर उपदेश और विभीषण से सार्थक संवाद का वर्णन है।
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कुंभकर्ण का जागना और उपदेश