हैं दससीस मनुज रघुनायक

चौपाई २, दोहा ६३ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

हैं दससीस मनुज रघुनायक। जाके हनूमान से पायक॥ अहह बंधु तैं कीन्हि खोटाई। प्रथमहिं मोहि न सुनाएहि आई॥ २ ॥

अर्थ

हे रावण! जिनके हनुमान्-सरीखे सेवक हैं, वे श्रीरघुनाथजी क्या मनुष्य हैं? हाय भाई! तूने बुरा किया, जो पहले ही आकर मुझे यह हाल नहीं सुनाया।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “कुंभकर्ण का जागना और उपदेश” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ६३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रावण द्वारा कुंभकर्ण को जगाने, उसके कठोर उपदेश और विभीषण से सार्थक संवाद का वर्णन है।

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कुंभकर्ण का जागना और उपदेश