वर्षा ऋतु वर्णन

वर्षा ऋतु के मेघ, पर्वत, वन और जलधाराओं का अत्यंत सुंदर चित्रण किया गया है। प्रकृति का यह वर्णन विरह, प्रतीक्षा और अंतर्मन के भावों को भी स्पर्श करता है।

किष्किन्धाकाण्ड · प्रकरण ७ / १४

प्रकरण पाठ

चौपाई

सुंदर बन कुसुमित अति सोभा। गुंजत मधुप निकर मधु लोभा॥ कंद मूल फल पत्र सुहाए। भए बहुत जब ते प्रभु आए ॥ १ ॥

अर्थ:

सुन्दर वन फूला हुआ अत्यन्त सुशोभित है। मधु के लोभ से भौंरों के समूह गुंजार कर रहे हैं। जब से प्रभु आये, तब से वन में सुन्दर कन्द, मूल, फल और पत्तों की बहुतायत हो गयी।

चौपाई

देखि मनोहर सैल अनूपा। रहे तहँ अनुज सहित सुरभूपा॥ मधुकर खग मृग तनु धरि देवा। करहिं सिद्ध मुनि प्रभु कै सेवा॥ २ ॥

अर्थ:

मनोहर और अनुपम पर्वत को देखकर देवताओं के सम्राट्‌ श्रीरामजी छोटे भाई सहित वहाँ रह गये। देवता, सिद्ध और मुनि भौंरों, पक्षियों और पशुओं के शरीर धारण करके प्रभु की सेवा करने लगे।

चौपाई

मंगलरूप भयउ बन तब ते। कीन्ह निवास रमापति जब ते॥ फटिक सिला अति सुभ्र सुहाई। सुख आसीन तहाँ द्वौ भाई॥ ३ ॥

अर्थ:

जब से रमापति श्रीरामजी ने वहाँ निवास किया तब से वन मंगलस्वरूप हो गया। सुन्दर स्फटिक मणि की एक अत्यन्त उज्ज्वल शिला है, उस पर दोनों भाई सुखपूर्वक विराजमान हैं।

चौपाई

कहत अनुज सन कथा अनेका। भगति बिरति नृपनीति बिबेका॥ बरषा काल मेघ नभ छाए। गरजत लागत परम सुहाए॥ ४ ॥

अर्थ:

श्रीरामजी छोटे भाई लक्ष्मणजी से भक्ति, वैराग्य, राजनीति और ज्ञान की अनेकों कथाएँ कहते हैं। वर्षाकाल में आकाश में छाये हुए बादल गरजते हुए बहुत ही सुहावने लगते हैं।

दोहा

लछिमन देखु मोर गन नाचत बारिद पेखि। गृही बिरतिरत हरष जस बिष्नुभगत कहुँ देखि॥ १३ ॥

अर्थ:

[श्रीरामजी कहने लगे--] हे लक्ष्मण! देखो, मोरों के झुंड बादलों को देखकर नाच रहे हैं। जैसे वैराग्य में अनुरक्त गृहस्थ किसी विष्णुभक्त को देखकर हर्षित होते हैं।

दोहा 14 के अंतर्गत
चौपाई

घन घमंड नभ गरजत घोरा। प्रिया हीन डरपत मन मोरा॥ दामिनि दमक रह न घन माहीं। खल कै प्रीति जथा थिर नाहीं॥ १ ॥

अर्थ:

आकाश में बादल घुमड़-घुमड़कर घोर गर्जना कर रहे हैं, प्रिया (सीताजी) के बिना मेरा मन डर रहा है। बिजली की चमक बादलों में ठहरती नहीं, जैसे दुष्ट की प्रीति स्थिर नहीं रहती।

चौपाई

बरषहिं जलद भूमि निअराएँ। जथा नवहिं बुध बिद्या पाएँ॥ बूँद अघात सहहिं गिरि कैसें। खल के बचन संत सह जैसें॥ २ ॥

अर्थ:

बादल पृथ्वी के समीप आकर (नीचे उतरकर) बरस रहे हैं, जैसे विद्या पाकर विद्वान्‌ नग्न हो जाते हैं। बूँदों की चोट पर्वत कैसे सहते हैं, जैसे दुष्टों के वचन संत सहते हैं।

चौपाई

छुद्र नदीं भरि चलीं तोराई। जस थोरेहुँ धन खल इतराई॥ भूमि परत भा ढाबर पानी। जनु जीवहि माया लपटानी॥ ३ ॥

अर्थ:

छोटी नदियाँ भरकर [किनारों को] तुड़ाती हुई चलीं, जैसे थोड़े धन से भी दुष्ट इतरा जाते हैं (मर्यादा का त्याग कर देते हैं)। पृथ्वी पर पड़ते ही पानी गँदला हो गया है, जैसे शुद्ध जीव के माया लिपट गयी हो।

चौपाई

समिटि समिटि जल भरहिं तलावा। जिमि सदगुन सज्जन पहिं आवा॥ सरिता जल जलनिधि महुँ जाई। होइ अचल जिमि जिव हरि पाई॥ ४ ॥

अर्थ:

जल एकत्र हो-होकर तालाबों में भर रहा है, जैसे सद्गुण [एक-एक कर] सज्जन के पास चले आते हैं। नदी का जल समुद्र में जाकर वैसे ही स्थिर हो जाता है, जैसे जीव श्रीहरि को पाकर अचल (आवागमन से मुक्त) हो जाता है।

दोहा

हरित भूमि तृन संकुल समुझि परहिं नहिं पंथ। जिमि पाखंड बाद तें गुप्त होहिं सदग्रंथ॥ १४ ॥

अर्थ:

पृथ्वी घास से परिपूर्ण होकर हरी हो गयी है, जिससे रास्ते समझ नहीं पड़ते। जैसे पाखण्ड-मत के प्रचार से सद्ग्रन्थ गुप्त (लुप्त) हो जाते हैं।

दोहा 15 के अंतर्गत
चौपाई

दादुर धुनि चहु दिसा सुहाई। बेद पढ़हिं जनु बटु समुदाई॥ नव पल्लव भए बिटप अनेका। साधक मन जस मिलें बिबेका॥ १ ॥

अर्थ:

चारों दिशाओं में मेढकों की ध्वनि ऐसी सुहावनी लगती है, मानो विद्यार्थियों के समुदाय वेद पढ़ रहे हों। अनेकों वृक्षों में नये पत्ते आ गये हैं, जिससे वे ऐसे हरे-भरे एवं सुशोभित हो गये हैं जैसे साधक का मन विवेक (ज्ञान) प्राप्त होने पर हो जाता है।

चौपाई

अर्क जवास पात बिनु भयऊ। जस सुराज खल उद्यम गयऊ॥ खोजत कतहुँ मिलइ नहिं धूरी। करइ क्रोध जिमि धरमहि दूरी॥ २ ॥

अर्थ:

मदार और जवासा बिना पत्ते के हो गये (उनके पत्ते झड़ गये)। जैसे श्रेष्ठ राज्य में दुष्टों का उद्यम जाता रहा (उनकी एक भी नहीं चलती)। धूल कहीं खोजने पर भी नहीं मिलती, जैसे क्रोध धर्म को दूर कर देता है (अर्थात् क्रोध का आवेश होने पर धर्म का ज्ञान नहीं रह जाता)।

चौपाई

ससि संपन्न सोह महि कैसी। उपकारी कै संपति जैसी॥ निसि तम घन खद्योत बिराजा। जनु दंभिन्ह कर मिला समाजा॥ ३ ॥

अर्थ:

अन्न से युक्त (लहलहाती हुई खेती से हरी-भरी) पृथ्वी कैसी शोभित हो रही है, जैसी उपकारी पुरुष की सम्पत्ति। रात के घने अन्धकार में जुगनू शोभा पा रहे हैं, मानो दम्भियों का समाज आ जुटा हो।

चौपाई

महाबृष्टि चलि फूटि किआरीं। जिमि सुतंत्र भएँ बिगरहिं नारीं॥ कृषी निरावहिं चतुर किसाना। जिमि बुध तजहिं मोह मद माना॥ ४ ॥

अर्थ:

भारी वर्ष से खेतों की क्यारियाँ फूट चली हैं, जैसे स्वतन्त्र होने से स्त्रियाँ बिगड़ जाती हैं। चतुर किसान खेतों को निरा रहे हैं (उनमें से घास आदि को निकालकर फेंक रहे हैं)। जैसे विद्वान् लोग मोह, मद और मान का त्याग कर देते हैं।

चौपाई

देखिअत चक्रबाक खग नाहीं। कलिहि पाइ जिमि धर्म पराहीं॥ ऊषर बरषइ तृन नहिं जामा। जिमि हरिजन हियँ उपज न कामा॥ ५ ॥

अर्थ:

चक्रवाक पक्षी दिखायी नहीं दे रहे हैं; जैसे कलियुग को पाकर धर्म भाग जाते हैं। ऊसर में वर्षा होती है, पर वहाँ घास तक नहीं उगती। जैसे हरिभक्त के हृदय में काम नहीं उत्पन्न होता।

चौपाई

बिबिध जंतु संकुल महि भ्राजा। प्रजा बाढ़ जिमि पाइ सुराजा॥ जहँ तहँ रहे पथिक थकि नाना। जिमि इंद्रिय गन उपजें ग्याना॥ ६ ॥

अर्थ:

पृथ्वी अनेक तरह के जीवों से भरी हुई उसी तरह शोभायमान है, जैसे सुराज्य पाकर प्रजा की वृद्धि होती है। जहाँ-तहाँ अनेक पथिक थककर ठहरे हुए हैं, जैसे ज्ञान उत्पन्न होने पर इन्द्रियाँ [शिथिल होकर विषयों की ओर जाना छोड़ देती हैं]।

दोहा

कबहुँ प्रबल बह मारुत जहँ तहँ मेघ बिलाहिं। जिमि कपूत के उपजें कुल सद्धर्म नसाहिं॥ १५ (क) ॥

अर्थ:

कभी-कभी वायु बड़े जोर से चलने लगती है, जिससे बादल जहाँ-तहाँ गायब हो जाते हैं। जैसे कुपुत्र के उत्पन्न होने से कुल के उत्तम धर्म (श्रेष्ठ आचरण) नष्ट हो जाते हैं।

दोहा

कबहुँदिवस महँ निबिड़ तम कबहुँक प्रगट पतंग। बिनसइउपजइ ग्यानजिमि पाइ कुसंग सुसंग॥ १५ (ख) ॥

अर्थ:

कभी [बादलों के कारण] दिन में घोर अन्धकार छा जाता है और कभी सूर्य प्रकट हो जाते हैं। जैसे कुसंग पाकर ज्ञान नष्ट हो जाता है और सुसंग पाकर उत्पन्न हो जाता है।