वर्षा ऋतु वर्णन
वर्षा ऋतु के मेघ, पर्वत, वन और जलधाराओं का अत्यंत सुंदर चित्रण किया गया है। प्रकृति का यह वर्णन विरह, प्रतीक्षा और अंतर्मन के भावों को भी स्पर्श करता है।
किष्किन्धाकाण्ड · प्रकरण ७ / १४
प्रकरण पाठ
छुद्र नदीं भरि चलीं तोराई। जस थोरेहुँ धन खल इतराई॥ भूमि परत भा ढाबर पानी। जनु जीवहि माया लपटानी॥ ३ ॥
अर्थ:
छोटी नदियाँ भरकर [किनारों को] तुड़ाती हुई चलीं, जैसे थोड़े धन से भी दुष्ट इतरा जाते हैं (मर्यादा का त्याग कर देते हैं)। पृथ्वी पर पड़ते ही पानी गँदला हो गया है, जैसे शुद्ध जीव के माया लिपट गयी हो।
समिटि समिटि जल भरहिं तलावा। जिमि सदगुन सज्जन पहिं आवा॥ सरिता जल जलनिधि महुँ जाई। होइ अचल जिमि जिव हरि पाई॥ ४ ॥
अर्थ:
जल एकत्र हो-होकर तालाबों में भर रहा है, जैसे सद्गुण [एक-एक कर] सज्जन के पास चले आते हैं। नदी का जल समुद्र में जाकर वैसे ही स्थिर हो जाता है, जैसे जीव श्रीहरि को पाकर अचल (आवागमन से मुक्त) हो जाता है।
दादुर धुनि चहु दिसा सुहाई। बेद पढ़हिं जनु बटु समुदाई॥ नव पल्लव भए बिटप अनेका। साधक मन जस मिलें बिबेका॥ १ ॥
अर्थ:
चारों दिशाओं में मेढकों की ध्वनि ऐसी सुहावनी लगती है, मानो विद्यार्थियों के समुदाय वेद पढ़ रहे हों। अनेकों वृक्षों में नये पत्ते आ गये हैं, जिससे वे ऐसे हरे-भरे एवं सुशोभित हो गये हैं जैसे साधक का मन विवेक (ज्ञान) प्राप्त होने पर हो जाता है।
अर्क जवास पात बिनु भयऊ। जस सुराज खल उद्यम गयऊ॥ खोजत कतहुँ मिलइ नहिं धूरी। करइ क्रोध जिमि धरमहि दूरी॥ २ ॥
अर्थ:
मदार और जवासा बिना पत्ते के हो गये (उनके पत्ते झड़ गये)। जैसे श्रेष्ठ राज्य में दुष्टों का उद्यम जाता रहा (उनकी एक भी नहीं चलती)। धूल कहीं खोजने पर भी नहीं मिलती, जैसे क्रोध धर्म को दूर कर देता है (अर्थात् क्रोध का आवेश होने पर धर्म का ज्ञान नहीं रह जाता)।
महाबृष्टि चलि फूटि किआरीं। जिमि सुतंत्र भएँ बिगरहिं नारीं॥ कृषी निरावहिं चतुर किसाना। जिमि बुध तजहिं मोह मद माना॥ ४ ॥
अर्थ:
भारी वर्ष से खेतों की क्यारियाँ फूट चली हैं, जैसे स्वतन्त्र होने से स्त्रियाँ बिगड़ जाती हैं। चतुर किसान खेतों को निरा रहे हैं (उनमें से घास आदि को निकालकर फेंक रहे हैं)। जैसे विद्वान् लोग मोह, मद और मान का त्याग कर देते हैं।
बिबिध जंतु संकुल महि भ्राजा। प्रजा बाढ़ जिमि पाइ सुराजा॥ जहँ तहँ रहे पथिक थकि नाना। जिमि इंद्रिय गन उपजें ग्याना॥ ६ ॥
अर्थ:
पृथ्वी अनेक तरह के जीवों से भरी हुई उसी तरह शोभायमान है, जैसे सुराज्य पाकर प्रजा की वृद्धि होती है। जहाँ-तहाँ अनेक पथिक थककर ठहरे हुए हैं, जैसे ज्ञान उत्पन्न होने पर इन्द्रियाँ [शिथिल होकर विषयों की ओर जाना छोड़ देती हैं]।