महाबृष्टि चलि फूटि किआरीं
महाबृष्टि चलि फूटि किआरीं
चौपाई ४, दोहा १५ के अंतर्गत · किष्किन्धाकाण्ड
चौपाई पाठ
महाबृष्टि चलि फूटि किआरीं। जिमि सुतंत्र भएँ बिगरहिं नारीं॥ कृषी निरावहिं चतुर किसाना। जिमि बुध तजहिं मोह मद माना॥ ४ ॥
अर्थ
भारी वर्ष से खेतों की क्यारियाँ फूट चली हैं, जैसे स्वतन्त्र होने से स्त्रियाँ बिगड़ जाती हैं। चतुर किसान खेतों को निरा रहे हैं (उनमें से घास आदि को निकालकर फेंक रहे हैं)। जैसे विद्वान् लोग मोह, मद और मान का त्याग कर देते हैं।
संदर्भ
यह किष्किन्धाकाण्ड के “वर्षा ऋतु वर्णन” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में वर्षा ऋतु में मेघ, पर्वत, वन और प्रकृति के सौंदर्य तथा विरह-भावों का वर्णन है।
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वर्षा ऋतु वर्णन