बरषहिं जलद भूमि निअराएँ
बरषहिं जलद भूमि निअराएँ
चौपाई २, दोहा १४ के अंतर्गत · किष्किन्धाकाण्ड
चौपाई पाठ
बरषहिं जलद भूमि निअराएँ। जथा नवहिं बुध बिद्या पाएँ॥ बूँद अघात सहहिं गिरि कैसें। खल के बचन संत सह जैसें॥ २ ॥
अर्थ
बादल पृथ्वी के समीप आकर (नीचे उतरकर) बरस रहे हैं, जैसे विद्या पाकर विद्वान् नग्न हो जाते हैं। बूँदों की चोट पर्वत कैसे सहते हैं, जैसे दुष्टों के वचन संत सहते हैं।
संदर्भ
यह किष्किन्धाकाण्ड के “वर्षा ऋतु वर्णन” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में वर्षा ऋतु में मेघ, पर्वत, वन और प्रकृति के सौंदर्य तथा विरह-भावों का वर्णन है।
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वर्षा ऋतु वर्णन