कबहुँदिवस महँ निबिड़ तम कबहुँक प्रगट

दोहा १५ (ख) · किष्किन्धाकाण्ड

दोहा पाठ

कबहुँदिवस महँ निबिड़ तम कबहुँक प्रगट पतंग। बिनसइउपजइ ग्यानजिमि पाइ कुसंग सुसंग॥ १५ (ख) ॥

अर्थ

कभी [बादलों के कारण] दिन में घोर अन्धकार छा जाता है और कभी सूर्य प्रकट हो जाते हैं। जैसे कुसंग पाकर ज्ञान नष्ट हो जाता है और सुसंग पाकर उत्पन्न हो जाता है।

संदर्भ

यह किष्किन्धाकाण्ड के “वर्षा ऋतु वर्णन” प्रकरण का दोहा १५ (ख) है। इस प्रकरण में वर्षा ऋतु में मेघ, पर्वत, वन और प्रकृति के सौंदर्य तथा विरह-भावों का वर्णन है।

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वर्षा ऋतु वर्णन