घन घमंड नभ गरजत घोरा

चौपाई १, दोहा १४ के अंतर्गत · किष्किन्धाकाण्ड

चौपाई पाठ

घन घमंड नभ गरजत घोरा। प्रिया हीन डरपत मन मोरा॥ दामिनि दमक रह न घन माहीं। खल कै प्रीति जथा थिर नाहीं॥ १ ॥

अर्थ

आकाश में बादल घुमड़-घुमड़कर घोर गर्जना कर रहे हैं, प्रिया (सीताजी) के बिना मेरा मन डर रहा है। बिजली की चमक बादलों में ठहरती नहीं, जैसे दुष्ट की प्रीति स्थिर नहीं रहती।

संदर्भ

यह किष्किन्धाकाण्ड के “वर्षा ऋतु वर्णन” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में वर्षा ऋतु में मेघ, पर्वत, वन और प्रकृति के सौंदर्य तथा विरह-भावों का वर्णन है।

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वर्षा ऋतु वर्णन