लछिमन देखु मोर गन नाचत बारिद
लछिमन देखु मोर गन नाचत बारिद
दोहा १३ · किष्किन्धाकाण्ड
दोहा पाठ
लछिमन देखु मोर गन नाचत बारिद पेखि। गृही बिरतिरत हरष जस बिष्नुभगत कहुँ देखि॥ १३ ॥
अर्थ
[श्रीरामजी कहने लगे--] हे लक्ष्मण! देखो, मोरों के झुंड बादलों को देखकर नाच रहे हैं। जैसे वैराग्य में अनुरक्त गृहस्थ किसी विष्णुभक्त को देखकर हर्षित होते हैं।
संदर्भ
यह किष्किन्धाकाण्ड के “वर्षा ऋतु वर्णन” प्रकरण का दोहा १३ है। इस प्रकरण में वर्षा ऋतु में मेघ, पर्वत, वन और प्रकृति के सौंदर्य तथा विरह-भावों का वर्णन है।
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वर्षा ऋतु वर्णन