ससि संपन्न सोह महि कैसी

चौपाई ३, दोहा १५ के अंतर्गत · किष्किन्धाकाण्ड

चौपाई पाठ

ससि संपन्न सोह महि कैसी। उपकारी कै संपति जैसी॥ निसि तम घन खद्योत बिराजा। जनु दंभिन्ह कर मिला समाजा॥ ३ ॥

अर्थ

अन्न से युक्त (लहलहाती हुई खेती से हरी-भरी) पृथ्वी कैसी शोभित हो रही है, जैसी उपकारी पुरुष की सम्पत्ति। रात के घने अन्धकार में जुगनू शोभा पा रहे हैं, मानो दम्भियों का समाज आ जुटा हो।

संदर्भ

यह किष्किन्धाकाण्ड के “वर्षा ऋतु वर्णन” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में वर्षा ऋतु में मेघ, पर्वत, वन और प्रकृति के सौंदर्य तथा विरह-भावों का वर्णन है।

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वर्षा ऋतु वर्णन