हरित भूमि तृन संकुल समुझि परहिं

दोहा १४ · किष्किन्धाकाण्ड

दोहा पाठ

हरित भूमि तृन संकुल समुझि परहिं नहिं पंथ। जिमि पाखंड बाद तें गुप्त होहिं सदग्रंथ॥ १४ ॥

अर्थ

पृथ्वी घास से परिपूर्ण होकर हरी हो गयी है, जिससे रास्ते समझ नहीं पड़ते। जैसे पाखण्ड-मत के प्रचार से सद्ग्रन्थ गुप्त (लुप्त) हो जाते हैं।

संदर्भ

यह किष्किन्धाकाण्ड के “वर्षा ऋतु वर्णन” प्रकरण का दोहा १४ है। इस प्रकरण में वर्षा ऋतु में मेघ, पर्वत, वन और प्रकृति के सौंदर्य तथा विरह-भावों का वर्णन है।

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वर्षा ऋतु वर्णन