तारा का विलाप, तारा को श्रीरामजी द्वारा उपदेश और सुग्रीव का राज्याभिषेक तथा अंगद को युवराज पद

बालि के निधन पर तारा शोक से विह्वल होकर विलाप करती है, तब श्रीरामजी उसे आत्मज्ञान और धैर्य का उपदेश देते हैं। इसके बाद सुग्रीव का राज्याभिषेक होता है और अंगद को युवराज पद प्रदान किया जाता है।

किष्किन्धाकाण्ड · प्रकरण ६ / १४

प्रकरण पाठ

चौपाई

राम बालि निज धाम पठावा। नगर लोग सब ब्याकुल धावा॥ नाना बिधि बिलाप कर तारा। छूटे केस न देह सँभारा॥ १ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी ने बालि को अपने परम धाम भेज दिया। नगर के सब लोग व्याकुल होकर दौड़े। बालि की स्त्री तारा अनेकों प्रकार से विलाप करने लगी। उसके बाल बिखरे हुए हैं और देह की सँभाल नहीं है।

चौपाई

तारा बिकल देखि रघुराया। दीन्ह ग्यान हरि लीन्ही माया॥ छिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित अति अधम सरीरा॥ २ ॥

अर्थ:

तारा को व्याकुल देखकर श्रीरघुनाथजी ने उसे ज्ञान दिया और उसकी माया (अज्ञान) हर ली। [उन्होंने कहा--] पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु--इन पाँच तत्त्वों से यह अत्यन्त अधम शरीर रचा गया है।

चौपाई

प्रगट सो तनु तव आगें सोवा। जीव नित्य केहि लगि तुम्ह रोवा॥ उपजा ग्यान चरन तब लागी। लीन्हेसि परम भगति बर मागी॥ ३ ॥

अर्थ:

वह शरीर तो प्रत्यक्ष तुम्हारे सामने सोया हुआ है, और जीव नित्य है। फिर तुम किसके लिये रो रही हो? जब ज्ञान उत्पन्न हो गया, तब वह भगवान् के चरणों लगी और उसने परम भक्ति का वर माँग लिया।

चौपाई

उमा दारु जोषित की नाईं। सबहि नचावत रामु गोसाईं॥ तब सुग्रीवहि आयसु दीन्हा। मृतक कर्म बिधिवत सब कीन्हा॥ ४ ॥

अर्थ:

शिवजी कहते हैं-- हे उमा! स्वामी श्रीरामजी सबको कठपुतली की तरह नचाते हैं। तदनन्तर श्रीरामजी ने सुग्रीव को आज्ञा दी और सुग्रीव ने विधिपूर्वक बालि का सब मृतक-कर्म किया।

चौपाई

राम कहा अनुजहि समुझाई। राज देहु सुग्रीवहि जाई॥ रघुपति चरन नाइ करि माथा। चले सकल [प्रेरित रघुनाथा॥ ५ ॥

अर्थ:

तब श्रीरामचन्द्रजी ने छोटे भाई लक्ष्मण को समझाकर कहा कि तुम जाकर सुग्रीव को राज्य दे दो। श्रीरघुनाथजी की प्रेरणा (आज्ञा) से सब लोग श्रीरघुनाथजी के चरणों में मस्तक नवाकर चले।

दोहा

लछिमन तुरत बोलाए पुरजन बिप्र समाज। राजु दीन्ह सुग्रीव कहँ अंगद कहँ जुबराज॥ ११ ॥

अर्थ:

लक्ष्मणजी ने तुरंत ही सब नगरनिवासियों को और ब्राह्मणों के समाज को बुला लिया और [उनके सामने] सुग्रीव को राज्य और अंगद को युवराज-पद दिया।

दोहा 12 के अंतर्गत
चौपाई

उमा राम सम हित जग माहीं। गुरु पितु मातु बंधु प्रभु नाहीं॥ सुर नर मुनि सब कै यह रीती। स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती॥ १ ॥

अर्थ:

हे पार्वती! जगत् में श्रीरामजी के समान हित करने वाला गुरु, पिता, माता, बन्धु और स्वामी कोई नहीं है। देवता, मनुष्य और मुनि सब की यह रीति है कि स्वार्थ के लिये ही सब प्रीति करते हैं।

चौपाई

बालि त्रास ब्याकुल दिन राती। तन बहु ब्रन चिंताँ जर छाती॥ सोइ सुग्रीव कीन्ह कपिराऊ। अति कृपाल रघुबीर सुभाऊ॥ २ ॥

अर्थ:

जो सुग्रीव दिन-रात बालि के भय से व्याकुल रहता था, जिसके शरीर में बहुत-से घाव हो गये थे और जिसकी छाती चिन्ता के मारे जला करती थी, उसी सुग्रीव को उन्होंने वानरों का राजा बना दिया। श्रीरामचन्द्रजी का स्वभाव अत्यन्त ही कृपालु है।

चौपाई

जानतहूँ अस प्रभु परिहरहीं। काहे न बिपति जाल नर परहीं॥ पुनि सुग्रीवहि लीन्ह बोलाई। बहु प्रकार नृपनीति सिखाई॥ ३ ॥

अर्थ:

जो लोग जानते हुए भी ऐसे प्रभु को त्याग देते हैं, वे क्यों न विपत्ति के जाल में फँसें ? फिर श्रीरामजी ने सुग्रीव को बुला लिया और बहुत प्रकार से उन्हें राजनीति की शिक्षा दी।

चौपाई

कह प्रभु सुनु सुग्रीव हरीसा। पुर न जाउँ दस चारि बरीसा॥ गत ग्रीषम बरषा रितु आई। रहिहउँ निकट सैल पर छाई॥ ४ ॥

अर्थ:

फिर प्रभु ने कहा--हे वानरपति सुग्रीव! सुनो, मैं चौदह वर्ष तक गाँव (बस्ती) में नहीं जाऊँगा। ग्रीष्म-ऋतु बीतकर वर्षा-ऋतु आ गयी। अतः मैं यहाँ पास ही पर्वत पर टिक रहूँगा।

चौपाई

अंगद सहित करहु तुम्ह राजू। संतत हृदयँ धरेहु मम काजू॥ जब सुग्रीव भवन फिरि आए। रामु प्रबरषन गिरि पर छाए॥ ५ ॥

अर्थ:

तुम अंगद सहित राज्य करो। मेरे काम का हृदय में सदा ध्यान रखना। तदनन्तर जब सुग्रीवजी घर लौट आये, तब श्रीरामजी प्रवर्षण पर्वत पर जा टिके।

दोहा

प्रथमहिं देवन्ह गिरि गुहा राखेउ रुचिर बनाइ। राम कृपानिधि कछु दिन बास करहिंगे आइ॥ १२ ॥

अर्थ:

देवताओं ने पहले से ही उस पर्वत की एक गुफा को सुन्दर बना (सजा) रखा था। उन्होंने सोच रखा था कि कृपा की खान श्रीरामजी कुछ दिन यहाँ आकर निवास करेंगे।