तारा का विलाप, तारा को श्रीरामजी द्वारा उपदेश और सुग्रीव का राज्याभिषेक तथा अंगद को युवराज पद
बालि के निधन पर तारा शोक से विह्वल होकर विलाप करती है, तब श्रीरामजी उसे आत्मज्ञान और धैर्य का उपदेश देते हैं। इसके बाद सुग्रीव का राज्याभिषेक होता है और अंगद को युवराज पद प्रदान किया जाता है।
किष्किन्धाकाण्ड · प्रकरण ६ / १४
प्रकरण पाठ
प्रगट सो तनु तव आगें सोवा। जीव नित्य केहि लगि तुम्ह रोवा॥ उपजा ग्यान चरन तब लागी। लीन्हेसि परम भगति बर मागी॥ ३ ॥
अर्थ:
वह शरीर तो प्रत्यक्ष तुम्हारे सामने सोया हुआ है, और जीव नित्य है। फिर तुम किसके लिये रो रही हो? जब ज्ञान उत्पन्न हो गया, तब वह भगवान् के चरणों लगी और उसने परम भक्ति का वर माँग लिया।
उमा राम सम हित जग माहीं। गुरु पितु मातु बंधु प्रभु नाहीं॥ सुर नर मुनि सब कै यह रीती। स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती॥ १ ॥
अर्थ:
हे पार्वती! जगत् में श्रीरामजी के समान हित करने वाला गुरु, पिता, माता, बन्धु और स्वामी कोई नहीं है। देवता, मनुष्य और मुनि सब की यह रीति है कि स्वार्थ के लिये ही सब प्रीति करते हैं।
बालि त्रास ब्याकुल दिन राती। तन बहु ब्रन चिंताँ जर छाती॥ सोइ सुग्रीव कीन्ह कपिराऊ। अति कृपाल रघुबीर सुभाऊ॥ २ ॥
अर्थ:
जो सुग्रीव दिन-रात बालि के भय से व्याकुल रहता था, जिसके शरीर में बहुत-से घाव हो गये थे और जिसकी छाती चिन्ता के मारे जला करती थी, उसी सुग्रीव को उन्होंने वानरों का राजा बना दिया। श्रीरामचन्द्रजी का स्वभाव अत्यन्त ही कृपालु है।