कबहुँ प्रबल बह मारुत जहँ तहँ
कबहुँ प्रबल बह मारुत जहँ तहँ
दोहा १५ (क) · किष्किन्धाकाण्ड
दोहा पाठ
कबहुँ प्रबल बह मारुत जहँ तहँ मेघ बिलाहिं। जिमि कपूत के उपजें कुल सद्धर्म नसाहिं॥ १५ (क) ॥
अर्थ
कभी-कभी वायु बड़े जोर से चलने लगती है, जिससे बादल जहाँ-तहाँ गायब हो जाते हैं। जैसे कुपुत्र के उत्पन्न होने से कुल के उत्तम धर्म (श्रेष्ठ आचरण) नष्ट हो जाते हैं।
संदर्भ
यह किष्किन्धाकाण्ड के “वर्षा ऋतु वर्णन” प्रकरण का दोहा १५ (क) है। इस प्रकरण में वर्षा ऋतु में मेघ, पर्वत, वन और प्रकृति के सौंदर्य तथा विरह-भावों का वर्णन है।
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वर्षा ऋतु वर्णन