समिटि समिटि जल भरहिं तलावा
समिटि समिटि जल भरहिं तलावा
चौपाई ४, दोहा १४ के अंतर्गत · किष्किन्धाकाण्ड
चौपाई पाठ
समिटि समिटि जल भरहिं तलावा। जिमि सदगुन सज्जन पहिं आवा॥ सरिता जल जलनिधि महुँ जाई। होइ अचल जिमि जिव हरि पाई॥ ४ ॥
अर्थ
जल एकत्र हो-होकर तालाबों में भर रहा है, जैसे सद्गुण [एक-एक कर] सज्जन के पास चले आते हैं। नदी का जल समुद्र में जाकर वैसे ही स्थिर हो जाता है, जैसे जीव श्रीहरि को पाकर अचल (आवागमन से मुक्त) हो जाता है।
संदर्भ
यह किष्किन्धाकाण्ड के “वर्षा ऋतु वर्णन” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में वर्षा ऋतु में मेघ, पर्वत, वन और प्रकृति के सौंदर्य तथा विरह-भावों का वर्णन है।
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वर्षा ऋतु वर्णन