बंदउँ अवध भुआल सत्य प्रेम जेहि

सोरठा १६ · बालकाण्ड

सोरठा पाठ

बंदउँ अवध भुआल सत्य प्रेम जेहि राम पद। बिछुरत दीनदयाल प्रिय तनु तृन इव परिहरेउ॥ १६ ॥

अर्थ

मैं अवध के राजा श्रीदशरथजी की वन्दना करता हूँ, जिनका श्रीरामजी के चरणों में सच्चा प्रेम था, जिन्होंने दीनदयालु प्रभु के बिछुड़ते ही अपने प्यारे शरीर को मामूली तिनके की तरह त्याग दिया।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “सीताराम और परिकर वन्दना” प्रकरण का सोरठा १६ है। इस प्रकरण में श्रीसीताराम, अयोध्यापुरी, सरयू, दशरथ, कौसल्या, लक्ष्मण और भक्त मुनियों की श्रद्धापूर्ण वन्दना का वर्णन है।

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सीताराम और परिकर वन्दना