जनकसुता जग जननि जानकी

चौपाई ४, दोहा १८ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

जनकसुता जग जननि जानकी। अतिसय प्रिय करुनानिधान की॥ ताके जुग पद कमल मनावउँ। जासु कृपाँ निरमल मति पावउँ॥ ४ ॥

अर्थ

राजा जनक की पुत्री, जगत् की जननी और करुणानिधान श्रीरामचन्द्रजी की प्रियतमा श्रीजानकीजी के दोनों चरणकमलों को मैं मनाता हूँ, जिनकी कृपा से निर्मल बुद्धि पाऊँ।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “सीताराम और परिकर वन्दना” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीसीताराम, अयोध्यापुरी, सरयू, दशरथ, कौसल्या, लक्ष्मण और भक्त मुनियों की श्रद्धापूर्ण वन्दना का वर्णन है।

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सीताराम और परिकर वन्दना