प्रनवउँ प्रथम भरत के चरना

चौपाई २, दोहा १७ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

प्रनवउँ प्रथम भरत के चरना। जासु नेम ब्रत जाइ न बरना॥ राम चरन पंकज मन जासू। लुबुध मधुप इव तजइ न पासू॥ २ ॥

अर्थ

[ भाइयों में] सबसे पहले मैं श्रीभरतजी के चरणों को प्रणाम करता हूँ, जिनका नियम और व्रत वर्णन नहीं किया जा सकता तथा जिनका मन श्रीरामजी के चरणकमलों में भौरे की तरह लुब्ध है, कभी उनका साथ नहीं छोड़ता।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “सीताराम और परिकर वन्दना” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीसीताराम, अयोध्यापुरी, सरयू, दशरथ, कौसल्या, लक्ष्मण और भक्त मुनियों की श्रद्धापूर्ण वन्दना का वर्णन है।

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सीताराम और परिकर वन्दना