समुझि सुमित्राँ राम सिय रूपु सुसीलु

दोहा ७३ · अयोध्याकाण्ड

दोहा पाठ

समुझि सुमित्राँ राम सिय रूपु सुसीलु सुभाउ। नृप सनेहु लखि धुनेउ सिरु पापिनि दीन्ह कुदाउ॥ ७३ ॥

अर्थ

सुमित्राजी ने श्रीरामजी और श्रीसीताजी के रूप, सुशील और स्वभाव को समझकर और राजा का प्रेम देखकर अपना सिर धुन लिया और कहा कि पापिनी कैकेयी ने बुरा दाँव लगाया।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-लक्ष्मण-संवाद” प्रकरण का दोहा ७३ है। इस प्रकरण में लक्ष्मणजी का श्रीराम के साथ वन जाने के लिए प्रेमपूर्ण आग्रह और श्रीराम द्वारा उन्हें कर्तव्य की शिक्षा का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
श्रीराम-लक्ष्मण-संवाद