लखन लखेउ भा अनरथ आजू
लखन लखेउ भा अनरथ आजू
चौपाई ४, दोहा ७३ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
लखन लखेउ भा अनरथ आजू। एहिं सनेह बस करब अकाजू॥ मागत बिदा सभय सकुचाहीं। जाइ संग बिधि कहिहि कि नाहीं॥ ४ ॥
अर्थ
लक्ष्मण ने देखा कि आज अनर्थ हुआ। ये स्नेह वश काम बिगाड़ देंगी! इसलिये वे विदा माँगते हुए भय से सकुचाते हैं [और मन-ही-मन सोचते हैं] कि जाकर [माता] साथ जाने को कहेंगी कि नहीं।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-लक्ष्मण-संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ७३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में लक्ष्मणजी का श्रीराम के साथ वन जाने के लिए प्रेमपूर्ण आग्रह और श्रीराम द्वारा उन्हें कर्तव्य की शिक्षा का वर्णन है।
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श्रीराम-लक्ष्मण-संवाद