उतरु न आवत प्रेम बस गहे
उतरु न आवत प्रेम बस गहे
दोहा ७१ · अयोध्याकाण्ड
दोहा पाठ
उतरु न आवत प्रेम बस गहे चरन अकुलाइ। नाथ दासु मैं स्वामि तुम्ह तजहु त काह बसाइ॥ ७१ ॥
अर्थ
प्रेमवश लक्ष्मणजी से कुछ उत्तर देते नहीं बनता। उन्होंने व्याकुल होकर श्रीरामजी के चरण पकड़ लिये और कहा—हे नाथ! मैं दास हूँ और आप स्वामी हैं; अतः आप मुझे छोड़ ही दें तो मेरा क्या वश है?
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-लक्ष्मण-संवाद” प्रकरण का दोहा ७१ है। इस प्रकरण में लक्ष्मणजी का श्रीराम के साथ वन जाने के लिए प्रेमपूर्ण आग्रह और श्रीराम द्वारा उन्हें कर्तव्य की शिक्षा का वर्णन है।
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श्रीराम-लक्ष्मण-संवाद