जहँ लगि जगत सनेह सगाई
जहँ लगि जगत सनेह सगाई
चौपाई ३, दोहा ७२ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
जहँ लगि जगत सनेह सगाई। प्रीति प्रतीति निगम निजु गाई॥ मोरें सबइ एक तुम्ह स्वामी। दीनबंधु उर अंतरजामी॥ ३ ॥
अर्थ
जगत में जहाँ तक स्नेह का सम्बन्ध, प्रेम और विश्वास है, जिनको स्वयं वेद ने गाया है—हे स्वामी! हे दीनबंधु! हे सब के हृदय के अंदर की जानने वाले! मेरे तो वे सब कुछ केवल आप ही हैं।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-लक्ष्मण-संवाद” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ७२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में लक्ष्मणजी का श्रीराम के साथ वन जाने के लिए प्रेमपूर्ण आग्रह और श्रीराम द्वारा उन्हें कर्तव्य की शिक्षा का वर्णन है।
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श्रीराम-लक्ष्मण-संवाद