करुनासिंधु सुबंधु के सुनि मृदु बचन
करुनासिंधु सुबंधु के सुनि मृदु बचन
दोहा ७२ · अयोध्याकाण्ड
दोहा पाठ
करुनासिंधु सुबंधु के सुनि मृदु बचन बिनीत। समुझाए उर लाइ प्रभु जानि सनेहँ सभीत॥ ७२ ॥
अर्थ
दयाके समुद्र श्रीरामचन्द्रजी ने भले भाई के कोमल और नम्रतायुक्त वचन सुनकर और उन्हें स्नेह के कारण डरे हुए जानकर, हृदय से लगाकर समझाया।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-लक्ष्मण-संवाद” प्रकरण का दोहा ७२ है। इस प्रकरण में लक्ष्मणजी का श्रीराम के साथ वन जाने के लिए प्रेमपूर्ण आग्रह और श्रीराम द्वारा उन्हें कर्तव्य की शिक्षा का वर्णन है।
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श्रीराम-लक्ष्मण-संवाद