मैं सिसु प्रभु सनेहँ प्रतिपाला
मैं सिसु प्रभु सनेहँ प्रतिपाला
चौपाई २, दोहा ७२ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
मैं सिसु प्रभु सनेहँ प्रतिपाला। मंदरु मेरु कि लेहिं मराला॥ गुर पितु मातु न जानउँ काहू। कहउँ सुभाउ नाथ पतिआहू॥ २ ॥
अर्थ
मैं तो प्रभु (आप) के स्नेह में पला हुआ छोटा बच्चा हूँ! क्या हंस भी मन्दराचल या सुमेरु पर्वत को उठा सकते हैं! हे नाथ! स्वभाव से ही कहता हूँ, आप विश्वास करें, मैं गुरु, पिता, माता किसी को भी नहीं जानता।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-लक्ष्मण-संवाद” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ७२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में लक्ष्मणजी का श्रीराम के साथ वन जाने के लिए प्रेमपूर्ण आग्रह और श्रीराम द्वारा उन्हें कर्तव्य की शिक्षा का वर्णन है।
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श्रीराम-लक्ष्मण-संवाद