हरषित हृदयँ मातु पहिं आए

चौपाई २, दोहा ७३ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

हरषित हृदयँ मातु पहिं आए। मनहुँ अंध फिरि लोचन पाए॥ जाइ जननि पग नायउ माथा। मनु रघुनंदन जानकि साथा॥ २ ॥

अर्थ

वे हर्षित हृदय से माता सुमित्राजी के पास आये, मानो अंधा फिर से नेत्र पा गया हो। उन्होंने जाकर माता के चरणों में मस्तक नवाया। किन्तु उनका मन रघुकुल को आनन्द देने वाले श्रीरामजी और जानकीजी के साथ था।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-लक्ष्मण-संवाद” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ७३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में लक्ष्मणजी का श्रीराम के साथ वन जाने के लिए प्रेमपूर्ण आग्रह और श्रीराम द्वारा उन्हें कर्तव्य की शिक्षा का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
श्रीराम-लक्ष्मण-संवाद