बरनि सप्रेम भरत अनुभाऊ

चौपाई २, दोहा २८९ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

बरनि सप्रेम भरत अनुभाऊ। तिय जिय की रुचि लखि कह राऊ॥ बहुरहिं लखनु भरतु बन जाहीं। सब कर भल सब के मन माहीं॥ २ ॥

अर्थ

इस प्रकार प्रेमपूर्वक भरतजी के प्रभाव का वर्णन करके, फिर पत्नी के मन की रुचि जानकर राजा ने कहा-- लक्ष्मणजी लौट जायँ और भरतजी वन को जाय, इसमें सभी का भला है और यही सब के मन में है।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “जनक-सुनयना संवाद, भरत की महिमा” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २८९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जनक और सुनयना द्वारा भरतजी के त्याग, विनय और भ्रातृभक्ति की महिमा का संवाद का वर्णन है।

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जनक-सुनयना संवाद, भरत की महिमा