अस कहि अति सकुचे रघुराऊ
अस कहि अति सकुचे रघुराऊ
चौपाई ४, दोहा २९० के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
अस कहि अति सकुचे रघुराऊ। मुनि पुलके लखि सीलु सुभाऊ॥ तुम्ह बिनु राम सकल सुख साजा। नरक सरिस दुहु राज समाजा॥ ४ ॥
अर्थ
ऐसा कहकर श्रीरघुनाथजी अत्यन्त ही सकुचा गये। उनका शील-स्वभाव देखकर [प्रेम और आनन्द से] मुनि वसिष्ठजी पुलकित हो गये। [उन्होंने खुलकर कहा-] हे राम! तुम्हारे बिना [घर-बार आदि] सम्पूर्ण सुखों के साज दोनों राजसमाजों को नरक के समान हैं।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “जनक-सुनयना संवाद, भरत की महिमा” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २९० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जनक और सुनयना द्वारा भरतजी के त्याग, विनय और भ्रातृभक्ति की महिमा का संवाद का वर्णन है।
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जनक-सुनयना संवाद, भरत की महिमा