गे नहाइ गुर पहिं रघुराई
गे नहाइ गुर पहिं रघुराई
चौपाई २, दोहा २९० के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
गे नहाइ गुर पहिं रघुराई। बंदि चरन बोले रुख पाई॥ नाथ भरतु पुरजन महतारी। सोक बिकल बनबास दुखारी॥ २ ॥
अर्थ
श्रीरघुनाथजी स्नान करके गुरु वसिष्ठजी के पास गये और चरणों की वन्दना करके उनका रुख पाकर बोले--हे नाथ! भरत, अवधपुरवासी तथा माताएँ, सब शोक से व्याकुल और वनवास से दुखी हैं।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “जनक-सुनयना संवाद, भरत की महिमा” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २९० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जनक और सुनयना द्वारा भरतजी के त्याग, विनय और भ्रातृभक्ति की महिमा का संवाद का वर्णन है।
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जनक-सुनयना संवाद, भरत की महिमा