सो मति मोरि भरत महिमाही

चौपाई ३, दोहा २८८ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

सो मति मोरि भरत महिमाही। कहै काह छलि छुअति न छाँही॥ बिधि गनपति अहिपति सिव सारद। कबि कोबिद बुध बुद्धि बिसारद॥ ३ ॥

अर्थ

वह (धर्म, राजनीति और ब्रह्मज्ञान में प्रवेश रखनेवाली) मेरी बुद्धि भरतजी की महिमा का वर्णन तो क्या करे, छल करके भी उसकी छाया तक को नहीं छू पाती! ब्रह्माजी, गणेशजी, शेषजी, महादेवजी, सरस्वतीजी, कवि, ज्ञानी, पण्डित और बुद्धिमान्--।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “जनक-सुनयना संवाद, भरत की महिमा” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २८८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जनक और सुनयना द्वारा भरतजी के त्याग, विनय और भ्रातृभक्ति की महिमा का संवाद का वर्णन है।

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जनक-सुनयना संवाद, भरत की महिमा