परमारथ स्वारथ सुख सारे

चौपाई ४, दोहा २८९ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

परमारथ स्वारथ सुख सारे। भरत न सपनेहुँ मनहुँ निहारे॥ साधन सिद्धि राम पग नेहू। मोहि लखि परत भरत मत एहू॥ ४ ॥

अर्थ

[श्रीरामचन्द्रजी के प्रति अनन्य प्रेम को छोड़कर] भरतजी ने समस्त परमार्थ, स्वार्थ और सुखों की ओर स्वप्न में भी मन से भी नहीं ताका है। श्रीरामजी के चरणों का प्रेम ही उनका साधन है और वही सिद्धि है। मुझे तो भरतजी का बस, यही एकमात्र सिद्धान्त जान पड़ता है।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “जनक-सुनयना संवाद, भरत की महिमा” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २८९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जनक और सुनयना द्वारा भरतजी के त्याग, विनय और भ्रातृभक्ति की महिमा का संवाद का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
जनक-सुनयना संवाद, भरत की महिमा