निरवधि गुन निरुपम पुरुषु भरतु भरत

दोहा २८८ · अयोध्याकाण्ड

दोहा पाठ

निरवधि गुन निरुपम पुरुषु भरतु भरत सम जानि। कहिअसुमेरु कि सेर सम कबिकुल मति सकुचानि॥ २८८ ॥

अर्थ

भरतजी असीम गुणसम्पन्न और उपमारहित पुरुष हैं। भरतजी के समान बस, भरतजी ही हैं, ऐसा जानो। सुमेरु पर्वत को क्या सेर के बराबर कह सकते हैं ? इसलिये (उन्हें किसी पुरुष के साथ उपमा देने में) कवि समाज की बुद्धि भी सकुचा गयी !।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “जनक-सुनयना संवाद, भरत की महिमा” प्रकरण का दोहा २८८ है। इस प्रकरण में जनक और सुनयना द्वारा भरतजी के त्याग, विनय और भ्रातृभक्ति की महिमा का संवाद का वर्णन है।

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जनक-सुनयना संवाद, भरत की महिमा