भरत चरित कीरति करतूती
भरत चरित कीरति करतूती
चौपाई ४, दोहा २८८ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
भरत चरित कीरति करतूती। धरम सील गुन बिमल बिभूती॥ समुझत सुनत सुखद सब काहू। सुचि सुरसरि रुचि निदर सुधाहू॥ ४ ॥
अर्थ
सब किसी को भरतजी के चरित्र, कीर्ति, करनी, धर्म, शील, गुण और निर्मल ऐश्वर्य समझने में और सुनने में सुख देने वाले हैं और पवित्रता में गंगाजी का तथा स्वाद (मधुरता) में अमृत का भी तिरस्कार करने वाले हैं।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “जनक-सुनयना संवाद, भरत की महिमा” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २८८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जनक और सुनयना द्वारा भरतजी के त्याग, विनय और भ्रातृभक्ति की महिमा का संवाद का वर्णन है।
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जनक-सुनयना संवाद, भरत की महिमा