सो सुखु करमु धरमु जरि जाऊ

चौपाई १, दोहा २९१ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

सो सुखु करमु धरमु जरि जाऊ। जहँ न राम पद पंकज भाऊ॥ जोगु कुजोगु ग्यानु अग्यानू। जहँ नहिं राम पेम परधानू॥ १ ॥

अर्थ

जहाँ श्रीराम के चरणकमलों में प्रेम नहीं है, वह सुख, कर्म और धर्म जल जाए। जिसमें श्रीराम-प्रेम की प्रधानता नहीं है, वह योग कुयोग है और वह ज्ञान अज्ञान है।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “जनक-सुनयना संवाद, भरत की महिमा” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २९१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जनक और सुनयना द्वारा भरतजी के त्याग, विनय और भ्रातृभक्ति की महिमा का संवाद का वर्णन है।

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जनक-सुनयना संवाद, भरत की महिमा