सुनि भूपाल भरत ब्यवहारू

चौपाई १, दोहा २८८ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

सुनि भूपाल भरत ब्यवहारू। सोन सुगंध सुधा ससि सारू॥ मूदे सजल नयन पुलके तन। सुजसु सराहन लगे मुदित मन॥ १ ॥

अर्थ

सोने में सुगंध और [समुद्र से निकली हुई] सुधा में चन्द्रमा के सार अमृत के समान भरतजी का व्यवहार सुनकर राजा ने [प्रेमविह्वल होकर] अपने [प्रेमाश्रुओं] के जल से भरे नेत्रों को मूँद लिया (वे भरतजी के प्रेम में मानो ध्यानस्थ हो गये)। वे शरीर से पुलकित हो गये और मन में आनन्दित होकर भरतजी के सुन्दर यश की सराहना करने लगे।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “जनक-सुनयना संवाद, भरत की महिमा” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २८८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जनक और सुनयना द्वारा भरतजी के त्याग, विनय और भ्रातृभक्ति की महिमा का संवाद का वर्णन है।

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जनक-सुनयना संवाद, भरत की महिमा