सावधान सुनु सुमुखि सुलोचनि
सावधान सुनु सुमुखि सुलोचनि
चौपाई २, दोहा २८८ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
सावधान सुनु सुमुखि सुलोचनि। भरत कथा भव बंध बिमोचनि॥ धरम राजनय ब्रह्मबिचारू। इहाँ जथामति मोर प्रचारू॥ २ ॥
अर्थ
[वे बोले--] हे सुमुखि! हे सुनयनी! सावधान होकर सुनो। भरतजी की कथा संसार के बन्धन से छुड़ाने वाली है। धर्म, राजनीति और ब्रह्मविचार--इन तीनों विषयों में अपनी बुद्धि के अनुसार मेरी [थोड़ी-बहुत] गति है (अर्थात् इनके सम्बन्ध में मैं कुछ जानता हूँ)।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “जनक-सुनयना संवाद, भरत की महिमा” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २८८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जनक और सुनयना द्वारा भरतजी के त्याग, विनय और भ्रातृभक्ति की महिमा का संवाद का वर्णन है।
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जनक-सुनयना संवाद, भरत की महिमा