भोरेहुँ भरत न पेलिहहिं मनसहुँ राम
भोरेहुँ भरत न पेलिहहिं मनसहुँ राम
दोहा २८९ · अयोध्याकाण्ड
दोहा पाठ
भोरेहुँ भरत न पेलिहहिं मनसहुँ राम रजाइ। करिअ न सोचु सनेह बस कहेउ भूप बिलखाइ॥ २८९ ॥
अर्थ
राजा ने बिलखकर (प्रेम से गद्गद होकर) कहा--भरतजी भूलकर भी श्रीरामचन्द्रजी की आज्ञा को मन से भी नहीं टालेंगे। अतः स्नेह के वश होकर चिन्ता नहीं करनी चाहिये।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “जनक-सुनयना संवाद, भरत की महिमा” प्रकरण का दोहा २८९ है। इस प्रकरण में जनक और सुनयना द्वारा भरतजी के त्याग, विनय और भ्रातृभक्ति की महिमा का संवाद का वर्णन है।
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जनक-सुनयना संवाद, भरत की महिमा