सुनि सुरबर सुरगुर बर बानी
सुनि सुरबर सुरगुर बर बानी
चौपाई २, दोहा २२० के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
सुनि सुरबर सुरगुर बर बानी। भा प्रमोदु मन मिटी गलानी॥ बरषि प्रसून हरषि सुरराऊ। लगे सराहन भरत सुभाऊ॥ २ ॥
अर्थ
देवगुरु बृहस्पतिजी की श्रेष्ठ वाणी सुनकर इन्द्र के मन में बड़ा आनन्द हुआ और उनकी चिन्ता मिट गयी। तब हर्षित होकर देवराज फूल बरसाकर भरतजी के स्वभाव की सराहना करने लगे।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “इन्द्र-बृहस्पति संवाद” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २२० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में इन्द्र की चिंता पर बृहस्पति द्वारा भरत-भक्ति की महिमा और राम-स्वभाव का उपदेश का वर्णन है।
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इन्द्र-बृहस्पति संवाद