देखि प्रभाउ सुरेसहि सोचू

चौपाई ४, दोहा २१७ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

देखि प्रभाउ सुरेसहि सोचू। जगु भल भलेहि पोच कहुँ पोचू॥ गुर सन कहेउ करिअ प्रभु सोई। रामहि भरतहि भेट न होई॥ ४ ॥

अर्थ

भरतजी के [इस प्रेम के] प्रभाव को देखकर देवराज इन्द्र को सोच हो गया [कि कहीं इनके प्रेमवश श्रीरामजी लौट न जायँ और हमारा बना-बनाया काम बिगड़ जाय]। संसार भले के लिये भला और बुरे के लिये बुरा है (मनुष्य जैसा आप होता है जगत्‌ उसे वैसा ही दीखता है)। उसने गुरु बृहस्पतिजी से कहा-हे प्रभो! वही उपाय कीजिये जिससे श्रीरामचन्द्रजी और भरतजी की भेंट ही न हो।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “इन्द्र-बृहस्पति संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २१७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में इन्द्र की चिंता पर बृहस्पति द्वारा भरत-भक्ति की महिमा और राम-स्वभाव का उपदेश का वर्णन है।

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इन्द्र-बृहस्पति संवाद