एहि बिधि भरत चले मग जाहीं

चौपाई ३, दोहा २२० के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

एहि बिधि भरत चले मग जाहीं। दसा देखि मुनि सिद्ध सिहाहीं॥ जबहिं रामु कहि लेहिं उसासा। उमगत पेमु मनहुँ चहु पासा॥ ३ ॥

अर्थ

इस प्रकार भरतजी मार्ग में चले जा रहे हैं। उनकी [प्रेममयी] दशा देखकर मुनि और सिद्ध लोग भी सिहाते हैं। भरतजी जभी 'राम' कहकर लंबी साँस लेते हैं, तभी मानो चारों ओर प्रेम उमड़ पड़ता है।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “इन्द्र-बृहस्पति संवाद” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २२० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में इन्द्र की चिंता पर बृहस्पति द्वारा भरत-भक्ति की महिमा और राम-स्वभाव का उपदेश का वर्णन है।

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इन्द्र-बृहस्पति संवाद