जद्यपि सम नहिं राग न रोषू

चौपाई २, दोहा २१९ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

जद्यपि सम नहिं राग न रोषू। गहहिं न पाप पूनु गुन दोषू॥ करम प्रधान बिस्व करि राखा। जो जस करइ सो तस फलु चाखा॥ २ ॥

अर्थ

यद्यपि वे सम हैं--उनमें न राग है, न रोष है। और न वे किसी का पाप-पुण्य और गुण-दोष ही ग्रहण करते हैं। उन्होंने विश्व में कर्म को ही प्रधान कर रखा है। जो जैसा करता है, वह वैसा ही फल भोगता है।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “इन्द्र-बृहस्पति संवाद” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २१९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में इन्द्र की चिंता पर बृहस्पति द्वारा भरत-भक्ति की महिमा और राम-स्वभाव का उपदेश का वर्णन है।

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इन्द्र-बृहस्पति संवाद