सत्यसंध प्रभु सुर हितकारी
सत्यसंध प्रभु सुर हितकारी
चौपाई १, दोहा २२० के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
सत्यसंध प्रभु सुर हितकारी। भरत राम आयस अनुसारी॥ स्वारथ बिबस बिकल तुम्ह होहू। भरत दोसु नहिं राउर मोहू॥ १ ॥
अर्थ
प्रभु श्रीरामचन्द्रजी सत्यप्रतिज्ञ और देवताओं के हित करनेवाले हैं। और भरतजी श्रीरामजी की आज्ञा के अनुसार चलनेवाले हैं। तुम व्यर्थ ही स्वार्थ के वश होकर व्याकुल हो रहे हो। इसमें भरतजी का कोई दोष नहीं, तुम्हारा ही मोह है।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “इन्द्र-बृहस्पति संवाद” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २२० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में इन्द्र की चिंता पर बृहस्पति द्वारा भरत-भक्ति की महिमा और राम-स्वभाव का उपदेश का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
इन्द्र-बृहस्पति संवाद