द्रवहिं बचन सुनि कुलिस पषाना
द्रवहिं बचन सुनि कुलिस पषाना
चौपाई ४, दोहा २२० के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
द्रवहिं बचन सुनि कुलिस पषाना। पुरजन पेमु न जाइ बखाना॥ बीच बास करि जमुनहिं आए। निरखि नीरु लोचन जल छाए॥ ४ ॥
अर्थ
उनके प्रेम और दीनतासे पूर्ण वचनों को सुनकर वज्र और पत्थर भी पिघल जाते हैं। अयोध्यावासियों का प्रेम कहते नहीं बनता। बीच में निवास करके भरतजी यमुनाजी के तट पर आये। यमुनाजी का जल देखकर उनके नेत्रों में जल भर आया।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “इन्द्र-बृहस्पति संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २२० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में इन्द्र की चिंता पर बृहस्पति द्वारा भरत-भक्ति की महिमा और राम-स्वभाव का उपदेश का वर्णन है।
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इन्द्र-बृहस्पति संवाद