तब किछु कीन्ह राम रुख जानी

चौपाई २, दोहा २१८ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

तब किछु कीन्ह राम रुख जानी। अब कुचालि करि होइहि हानी॥ सुनु सुरेस रघुनाथ सुभाऊ। निज अपराध रिसाहिं न काऊ॥ २ ॥

अर्थ

उस समय (पिछली बार) तो श्रीरामचन्द्रजी का रुख जानकर कुछ किया था। परन्तु इस समय कुचाल करने से हानि ही होगी। हे देवराज! श्रीरघुनाथजी का स्वभाव सुनो, वे अपने प्रति किये हुए अपराध से कभी रुष्ट नहीं होते।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “इन्द्र-बृहस्पति संवाद” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २१८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में इन्द्र की चिंता पर बृहस्पति द्वारा भरत-भक्ति की महिमा और राम-स्वभाव का उपदेश का वर्णन है।

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इन्द्र-बृहस्पति संवाद