बचन सुनत सुरगुरु मुसुकाने

चौपाई १, दोहा २१८ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

बचन सुनत सुरगुरु मुसुकाने। सहसनयन बिनु लोचन जाने॥ मायापति सेवक सन माया। करइ त उलटि परइ सुरराया॥ १ ॥

अर्थ

इन्द्र के वचन सुनते ही देवगुरु बृहस्पतिजी मुसकराये। उन्होंने हजार नेत्रोंवाले इन्द्र को [ज्ञानरूपी] नेत्रों से रहित (मूर्ख) समझा और कहा-हे देवराज! मायापति श्रीरामचन्द्रजी के सेवक के साथ कोई माया करता है तो वह उलटकर अपने ही ऊपर आ पड़ती है।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “इन्द्र-बृहस्पति संवाद” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २१८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में इन्द्र की चिंता पर बृहस्पति द्वारा भरत-भक्ति की महिमा और राम-स्वभाव का उपदेश का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
इन्द्र-बृहस्पति संवाद